रूस-यूक्रेन युद्ध सितंबर 2026 में एक ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां लड़ाई सिर्फ मोर्चे पर कब्जे की नहीं रही। दोनों पक्ष लंबी दूरी के ड्रोन और मिसाइलों से एक-दूसरे की ऊर्जा, तेल, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और संचार व्यवस्था को निशाना बना रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि शांति वार्ता की चर्चाओं के साथ-साथ हमले भी तेज हैं।
हाल के दिनों में यूक्रेन ने रूस के भीतर बड़े ड्रोन हमले किए। यूक्रेनी बलों ने एक रात में 1,000 से ज्यादा ड्रोन दागे। मॉस्को के मेयर ने राजधानी पर हुए हमले को अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला बताया। मॉस्को क्षेत्र में दो लोगों की मौत और मॉस्को ऑयल रिफाइनरी को नुकसान की बात अधिकारियों ने कही। इन दावों के अलग-अलग हिस्सों की पुष्टि का स्तर एक जैसा नहीं है, इसलिए सैन्य पक्षों के बयानों को सावधानी से देखना जरूरी है।
यूक्रेन का कहना है कि रूस की युद्ध क्षमता और कमाई पर दबाव बनाने के लिए उसकी रिफाइनरियों, सैन्य उद्योग और सप्लाई नेटवर्क को निशाना बनाया जा रहा है। राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने यह भी कहा है कि अगर रूस यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकता है, तो कीव रूसी ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोक सकता है। यह एकतरफा पेशकश है, कोई लागू हो चुका युद्धविराम नहीं।
रूस की तरफ से हमलों का दायरा भी बदला है। सितंबर के मध्य से यूक्रेन के इंटरनेट नेटवर्क और डेटा सेंटरों पर हमले बढ़ने की जानकारी सामने आई है। रूसी रक्षा मंत्रालय ऐसे ठिकानों को खुफिया जानकारी और सैन्य संचार से जोड़कर कार्रवाई को सही ठहराता है। लेकिन हमले का घोषित निशाना सैन्य हो, इससे नागरिक नुकसान का सवाल खत्म नहीं होता।
संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार निगरानी टीम के आंकड़े बताते हैं कि 2026 में यूक्रेन में आम लोगों पर युद्ध का असर तेजी से बढ़ा है। साल की पहली छमाही में कम से कम 1,396 नागरिक मारे गए और 7,978 घायल हुए। यह पिछले साल की इसी अवधि से 37 फीसदी ज्यादा है। अगस्त में भी कम से कम 372 लोगों की मौत और 2,349 लोगों के घायल होने की जानकारी दर्ज की गई। ये सत्यापित न्यूनतम आंकड़े हैं; वास्तविक संख्या इससे ज्यादा हो सकती है।
इस बढ़ते नुकसान का एक कारण यह है कि हमले अब सिर्फ सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं हैं। कीव जैसे बड़े शहरों में मिसाइल और ड्रोन हमलों से अस्पतालों और दूसरी नागरिक इमारतों को नुकसान पहुंचा है। वहीं, मोर्चे के करीब छोटे ड्रोन रोजमर्रा की आवाजाही को भी खतरनाक बना रहे हैं। आने वाली सर्दियों में ऊर्जा ढांचे पर हमले और बिजली, गर्मी तथा पानी की सप्लाई पर दबाव बड़ा मानवीय संकट बन सकता है।
जमीन पर रूस ने सूमी क्षेत्र और दूसरे इलाकों में बढ़त के दावे किए हैं। हालांकि स्वतंत्र भू-स्थानिक जांच में इन दावों के मुकाबले काफी सीमित बढ़त दिखाई गई है। इसलिए रूस या यूक्रेन के रक्षा मंत्रालयों के दावों को स्वतंत्र पुष्टि के बिना अंतिम सैन्य सच मानना ठीक नहीं होगा। फिलहाल तस्वीर यह है कि रूस के 2026 के बड़े अभियानों ने अपने घोषित लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं किए हैं, जबकि लड़ाई लगातार महंगी और लंबी हो रही है।
कूटनीति के मोर्चे पर भी स्थिति दोहरी है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि यूक्रेन पर समझौते के सभी प्रस्ताव मेज पर हैं, लेकिन रूस को अपने हितों का आकलन करना होगा। इसके कुछ दिन पहले क्रेमलिन ने कहा था कि शांतिपूर्ण बातचीत की दिशा में बढ़ने के लिए अभी जरूरी आधार मौजूद नहीं हैं। यानी मॉस्को बातचीत के लिए खुले होने का संकेत दे रहा है, लेकिन किसी ठोस वार्ता या युद्धविराम की शुरुआत नहीं हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जेलेंस्की की न्यूयॉर्क में मुलाकात के बाद भी कोई पक्का समझौता सामने नहीं आया। ट्रंप ने समझौते की संभावना जताई, जबकि जेलेंस्की ने पुतिन से मिलने की तैयारी बताई और यह संकेत दिया कि मॉस्को अभी युद्ध खत्म करने के लिए तैयार नहीं दिखता। कूटनीतिक संपर्क जारी हैं, लेकिन रूस के युद्ध लक्ष्य और यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता की मांग के बीच दूरी बनी हुई है।
यूक्रेन के लिए हवाई सुरक्षा सबसे बड़ी जरूरतों में है। जेलेंस्की ने दावा किया है कि अमेरिका ने यूक्रेन को पैट्रियट मिसाइलों के उत्पादन के लिए लाइसेंस देने का फैसला किया है। हालांकि इस फैसले के लागू होने, उत्पादन शुरू होने या मिसाइलों की आपूर्ति की स्वतंत्र अमेरिकी पुष्टि अभी जरूरी है। इसलिए इसे तत्काल सैन्य बदलाव की तरह पेश करना जल्दबाजी होगी।
युद्ध का असर यूक्रेन और रूस से बाहर भी दिखाई दे रहा है। ड्रोन और संदिग्ध हवाई घटनाओं के बाद नाटो और यूरोपीय देशों की चिंता बढ़ी है। लिथुआनिया में एक ड्रोन को नाटो विमानों ने मार गिराया, लेकिन उसके स्रोत की जांच जारी थी। नाटो सीधे रूस से युद्ध में उतरने के बजाय यूक्रेन को समर्थन और अपनी सीमाओं पर रोकथाम मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
यूरोपीय संघ ने यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता को नुकसान पहुंचाने से जुड़े 3,000 से ज्यादा व्यक्तियों और संस्थाओं पर लगे प्रतिबंध सितंबर 2029 तक बढ़ा दिए हैं। इससे साफ है कि यूरोप रूस पर दबाव बनाए रखने की नीति से पीछे नहीं हट रहा। दूसरी ओर, रूस में हुए संसदीय चुनाव ने क्रेमलिन का घरेलू नियंत्रण दिखाया, लेकिन उस चुनाव में वास्तविक विपक्ष की गुंजाइश बेहद सीमित रही और कब्जे वाले यूक्रेनी इलाकों में मतदान को कीव तथा कई देशों ने अवैध बताया।
इस युद्ध का असर खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ता है। रूस और यूक्रेन दुनिया के गेहूं और मक्का निर्यात में बड़ा हिस्सा रखते हैं। काला सागर के रास्तों, बंदरगाहों या अनाज आपूर्ति पर किसी भी नए हमले से आयात पर निर्भर देशों में कीमतों और उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। दक्षिण एशिया के लिए यह पहलू सैन्य घटनाओं जितना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल युद्ध का सबसे साफ निष्कर्ष यह है कि मोर्चे पर निर्णायक बदलाव न होने के बावजूद संघर्ष का दायरा फैल रहा है। ड्रोन, ऊर्जा, डेटा सेंटर, बंदरगाह और सीमावर्ती हवाई क्षेत्र अब युद्ध के नए मोर्चे हैं। आगे सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि क्या बातचीत हमलों से अलग कोई वास्तविक रास्ता खोलती है, या दोनों पक्ष सर्दियों से पहले अपनी मारक क्षमता और दबाव बढ़ाते रहेंगे।