लेकिन इस घोषणा की असली अहमियत सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं है।

BRICS देशों ने उन एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर भी चिंता जताई जिन्हें वे वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने वाला मानते हैं। यह मुद्दा सीधे उस वैश्विक आर्थिक व्यवस्था से जुड़ता है जिसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों की भूमिका लंबे समय से सबसे मजबूत रही है।

यानी दिल्ली से BRICS का संदेश दो मोर्चों पर गया है—युद्ध और व्यापार।

भारत के लिए इसमें क्या खास है?

भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और नई दिल्ली में हुए सम्मेलन की मेजबानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की।

सम्मेलन से पहले भारतीय पक्ष की प्राथमिकताओं में आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, मजबूत बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी जैसे मुद्दे शामिल थे।

यानी भारत BRICS को सिर्फ अमेरिका-विरोधी मंच बनाने के बजाय इसे एक ऐसे मंच के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है जहां Global South की आवाज वैश्विक फैसलों में ज्यादा मजबूत हो।

यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती भी है।

BRICS के अंदर ही ऐसे देश मौजूद हैं जिनके हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से टकराते हैं। ईरान और UAE की West Asia को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं। रूस और चीन का पश्चिम के साथ तनाव है, जबकि भारत के अमेरिका और यूरोप के साथ भी महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं।

इसके बावजूद दिल्ली में सभी को एक संयुक्त घोषणा पर लाना अपने आप में आसान काम नहीं था।

आतंकवाद पर भी भारत की छाप

BRICS के New Delhi Declaration में आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख और आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ कार्रवाई की प्रतिबद्धता भी शामिल की गई है। भारतीय पक्ष पहले से इस बात पर जोर देता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए।

भारत के लिए यह सिर्फ एक सामान्य कूटनीतिक बयान नहीं है।

नई दिल्ली लंबे समय से आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में रखने की कोशिश करती रही है। BRICS जैसे बड़े बहुपक्षीय मंच से इस मुद्दे पर व्यापक समर्थन भारत के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

असली खेल क्या है?

RAJNITIK SAPERA की नजर में असली कहानी यही है।

BRICS अब सिर्फ पांच देशों का आर्थिक क्लब नहीं रह गया है। इसके विस्तार के बाद इसमें एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दूसरे उभरते क्षेत्रों की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।

इसलिए इसके भीतर बनने वाली सहमति का असर सिर्फ सदस्य देशों तक सीमित नहीं रहता।

चीन BRICS को एक अधिक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ते देखना चाहता है। रूस पश्चिमी आर्थिक और राजनीतिक दबाव के खिलाफ इस मंच को उपयोगी मानता है। ईरान के लिए यह पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक विकल्पों का मंच है।

और भारत का खेल थोड़ा अलग है।

भारत चाहता है कि Global South की आवाज मजबूत हो, लेकिन साथ ही वह BRICS को ऐसा मंच नहीं बनने देना चाहता जो सीधे किसी एक शक्ति-गुट के खिलाफ खड़ा दिखाई दे।

यही वजह है कि दिल्ली का संदेश है—बहुध्रुवीय दुनिया चाहिए, लेकिन टकराव नहीं।

निष्कर्ष

नई दिल्ली घोषणा को सिर्फ एक और अंतरराष्ट्रीय बयान समझना गलती होगी।

इसके पीछे दुनिया की बदलती शक्ति-संरचना की बड़ी कहानी छिपी है।

एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगियों का प्रभाव है। दूसरी तरफ चीन, रूस और दूसरे उभरते देश अपनी भूमिका बढ़ाना चाहते हैं।

और इनके बीच भारत अपनी जगह बना रहा है।

दिल्ली की इस BRICS बैठक में भारत ने किसी एक खेमे का झंडा नहीं उठाया—बल्कि कोशिश की कि बदलती दुनिया में भारत खुद एक ऐसा केंद्र बने जिसके बिना बड़ी कूटनीतिक गणित पूरी न हो।

यही है राजनीतिक शतरंज।

Source: Reuters Published: 12 सितंबर 2026