भारत और रूस ऐसे वक्त अपने रिश्ते मजबूत कर रहे हैं जब दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध, ईरान-अमेरिका संघर्ष और समुद्री व्यापार में रुकावटों ने भारत के लिए विदेश नीति का संतुलन और मुश्किल कर दिया है।
100 अरब डॉलर का लक्ष्य
भारत और रूस ने 2030 तक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को करीब 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। Reuters के मुताबिक 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 70 अरब डॉलर था।
यानी अगले कुछ वर्षों में दोनों देश व्यापार को करीब 30 अरब डॉलर और बढ़ाने की कोशिश करेंगे।
इसमें ऊर्जा का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है।
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा जरूरतों के लिए सस्ता, सुरक्षित और भरोसेमंद तेल जरूरी है।
यही मुद्दा भारत-रूस रिश्तों को आज के दौर में खास बनाता है।
अमेरिका का दबाव और भारत का हिसाब
रूस के साथ भारत के बढ़ते ऊर्जा संबंध अमेरिका और पश्चिमी देशों की नजर से भी छिपे नहीं हैं।
अमेरिका ने उन देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी है जो रूसी तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं। इसके बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को पूरी तरह पश्चिमी दबाव के हिसाब से बदलने से इनकार किया है।
नई दिल्ली का तर्क सीधा है—
भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा का फैसला अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर करना है।
यही वह जगह है जहां भारत की विदेश नीति की असली परीक्षा होती है।
एक तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं। दूसरी तरफ रूस भारत का दशकों पुराना रक्षा और ऊर्जा साझेदार है।
और इसी के बीच चीन भी तेजी से अपनी वैश्विक भूमिका बढ़ा रहा है।
रूस BRICS को क्या बनाना चाहता है?
पुतिन ने BRICS Business Forum में कहा कि BRICS को वैश्विक विकास के लिए एक ऐसा मंच बनना चाहिए जो पश्चिमी नियमों से स्वतंत्र होकर काम कर सके।
रूस BRICS को सिर्फ राजनीतिक बातचीत का मंच नहीं बल्कि व्यापार, तकनीक, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और भुगतान व्यवस्था में ज्यादा व्यावहारिक सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है।
यही सोच भारत के लिए दिलचस्प भी है और चुनौतीपूर्ण भी।
भारत BRICS में सक्रिय भूमिका निभाता है, लेकिन वह इस संगठन को सिर्फ पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में नहीं देखना चाहता।
भारत की कोशिश है कि BRICS में Global South की आवाज मजबूत हो, लेकिन साथ ही अमेरिका और यूरोप के साथ उसके रिश्ते भी खराब न हों।
समुद्री रास्तों पर भी चर्चा
मोदी और पुतिन ने यूक्रेन तथा पश्चिम एशिया के संघर्षों से पैदा हुई समुद्री व्यापार की समस्याओं पर भी चर्चा की।
भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों नेताओं ने इन संघर्षों के कारण समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ने वाले असर पर विचार साझा किए।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का व्यापार बड़े पैमाने पर समुद्री रास्तों पर निर्भर है।
अगर युद्धों के कारण समुद्री रास्ते असुरक्षित होते हैं तो उसका असर सिर्फ जहाजों पर नहीं पड़ता।
तेल महंगा हो सकता है। बीमा महंगा हो सकता है। सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। और आखिरकार इसका असर आम भारतीय की जेब तक पहुंच सकता है।
सपेरा की नज़र
RAJNITIK SAPERA की नजर में इस मुलाकात की सबसे बड़ी कहानी यही है—भारत रूस के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है।
भारत का खेल इससे ज्यादा पेचीदा है।
नई दिल्ली एक तरफ रूस से तेल और रक्षा सहयोग बनाए रखना चाहती है।
दूसरी तरफ अमेरिका के साथ टेक्नोलॉजी, निवेश और रणनीतिक साझेदारी भी बढ़ाना चाहती है।
चीन के साथ सीमा और व्यापार के सवाल हैं।
ईरान के साथ ऊर्जा और समुद्री रास्तों के सवाल हैं।
और खाड़ी के अरब देशों के साथ भारत के आर्थिक हित जुड़े हैं।
यानी भारत को एक ऐसी दुनिया में अपनी जगह बनानी है जहां पुराने गुट कमजोर हो रहे हैं और नए शक्ति-संतुलन बन रहे हैं।
पुतिन की दिल्ली यात्रा सिर्फ भारत-रूस दोस्ती की कहानी नहीं है।
यह उस बड़े खेल का हिस्सा है जिसमें भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय हर बड़े खेमे के साथ अपने हितों का हिसाब बैठा रहा है।
और यही है—
राजनीतिक शतरंज।
Source: Reuters Published: 11 सितंबर 2026

